Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 91, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 91, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
सती सर्वगता संवित्प्राणस्पन्देन बोध्यते ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतराकारा गन्धलेखेव वायुना ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, व्युत्थानकाल में ही प्रतिभासरूप से अनुभूत होने से मानों साकार स्वरूप को प्राप्त तथा
सन्मात्रस्वभाव की प्राप्ति होने के कारण देह आदि-परिच्छेद के संस्पर्श से शून्य जो जीवन्मुक्त का
स्वरूप है, यह मननीय विषय के न रहने से उसका सरूप मनोनाश है