Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verses 57–59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verses 57–59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 57-59
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हिन्दी अर्थ
चित्त का वृक्षरूप से वर्णन कर रहे महाराज वस्रिष्ठजी वासना के क्षय से चित्त विनाश होता है, यों
कहते हैं।
हे श्रीरामजी, सुख और दुःख के मननात्मक स्पन्दन से उक्त, शरीररूपी महान् फल से समन्वित,
कार्यरूपी पल्लवं से पूर्ण आकार को धारण करनेवाला, तृष्णारूपी काले साँपों से वेष्टित, राग तथा
रोग रूपी बगुलों का आश्रय, अज्ञानरूपी दृढ मूल से संयुक्त, इन्द्रियरूपी पक्षियों से आक्रान्त चित्तरूपी
वृक्ष को क्षीणता-गप्राप्त वासना उस प्रकार गिरा देती है, जिस प्रकार काल से परिपक्व फल को वायु
प्रवाह गिरा देता हे