Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verses 60–62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verses 60–62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 60-62
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उसी चित्त का आँधी से उडाये गये धूलि के ढेर के रूप में वर्णन करते हुए, जिस प्रकार पवन के
निरोध से धूलिपटल का नाश हो जाता है, उसी प्रकार प्राणस्पन्दन के निरोध से मनरूपी धूलि-पटल
का विनाश हो जाता है, यों कहते हैं।
हे श्रीरामजी, समस्त दिशाओं को मलिन करनेवाली, पूर्ण चैतन्य रूपी (पक्ष में सर्वजननेत्ररूपी)
अखिलदर्शन को ढक देनेवाली, चंचलमेघ के सदृश आकारवाली, अज्ञानरूपी झाड़ु से आविर्भूत,
तृष्णारूपी तृणखण्डों से व्याप्त, स्तम्भ के सदृश आकारवाली देह से (पक्ष में वात्यासंस्थान से यानी
धूलिस्तम्भ से) युक्त, प्रस्फुरित हो रहे स्वल्प स्वल्प वृत्तियों से (पक्ष मेँ विभिन्न दिशाओं से
आनेवाले वायुओं के झुंडों से) क्षुब्ध, सब दिशाओं में उड़ने में दक्ष ओर भीतर में स्थित ब्रह्म के (पक्ष
में सूर्य के प्रकाश के) प्रत्यक्षीकरण में असमर्थ पवन से उड़ाई गई चित्तरूपी धूलि प्राणस्पन्दन के
निरोध से अनायास क्षणभर में विलीन हो जाती है