Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 66
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 66
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हिन्दी अर्थ
संवित् के साथ अभेद-भावना ही संवेद्य का परित्याग है, ऐसा कहते हैँ ।
हे राघव, संवित् ही अपनी धीरता का परित्याग कर संवेद्यस्वरूप-सी बनकर चित्त बीजरूप हो
जाती है, यह आप जानिए, जिस प्रकार तिल तेल से रहित नहीं है,उस प्रकार संवित् से रहित कोई
भी संवेद्य पदार्थ प्रसिद्ध नहीं हे