Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 67
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हिन्दी अर्थ
न बाहर ओर न तो भीतर कोई भी संवेद्य संवित् से अलग
रहता है, अपने संकल्प से संवित् ही प्रस्फुरित होती हुई स्वयं संवेद्य को देखती है