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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 92, Verse 98

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 92, verse 98 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 92 · श्लोक 98

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त प्रणाली से भली प्रकार शोधन करने के अनन्तर परिशेषरूप से अवशिष्ट हुई संवित्‌ अन्तःकरण मे संवित्‌-प्रतिबिम्बस्वरूप ही है, इस प्रकार की श्रोतृ-वर्ग की भान्ति का निरास कर रहे श्रीवसिष्ठ महाराज अयिविस्फुलिगन्याय से प्रतिबिम्ब की बीजभूत सन्मात्रस्वरूप ब्रह्मसवित्‌ ही उक्त संवित्‌ है, यो दिखलाते है। हे श्रीरामजी, इस संवित्‌ का सन्मात्रस्वरूप ब्रह्म ही बीज कहा जाता है । जिस प्रकार सूर्य आदि तेज से प्रभा उदित होती है, उस प्रकार यह प्रतिविम्बभूत संवित्‌ बिम्बभूत संविन्मात्रस्वरूप ब्रह्म से ही उदित होती है