Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 93, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 93, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
केषु क्वचिन्न बध्नाति स्वायत्तेष्वप्यसक्तधीः ।
राम स्पर्शरतिं धीरो हंसो मरुमहीष्विव ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जो प्राणवायु का व्यापार है, वही चित्तस्पन्दन हे, उसी से समस्त
जगत् उस प्रकार उत्पन्न होते हैं, जिस प्रकार धूलि आदि के ढेर से रज उत्पन्न होती है