Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 1, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
आक्षुब्धा क्षुब्धपक्षालिः पञ्जरस्था खगावली ।
भूकम्पे तरसाऽऽतालीपल्लवेव वनावली ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, आत्मा के कर्तृत्व और अकर्तृत्व का विचार भी इसी अखण्ड
ब्रह्मज्ञान के उद्देश्य से मैंने कहा है । मेरे कहने पर भी उक्त अखण्डात्मता का आपको परिज्ञान नहीं
हुआ, अतएव आपकी वासना क्षीण नहीं हुई हे, ऐसी मे संभावना करता हूँ