Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अन्तः संलीनमननं परितः सुप्तवासनम् ।
सुषुप्तं जडधर्मापि जन्म दुःखशतप्रदम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसके भीतर मानस व्यापाररूप मनन
भली प्रकार लीन हो गया है तथा चारों ओर से जिसमें वासनाएँ तिरोहित हो गई हैं, वह पाषाणादि की
तरह वृत्तिशून्य भी सुषुप्ति सैकड़ों जन्मरूपी दुःखों को देती है