Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 10, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
भस्मन्यथानित्यरूपा पांसुष्वप्यणुरूपिणी ।
असितेष्वसितस्थित्या सितधारतयासिषु ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
ओर भस्म तथा धूलियों में प्राक्तन काष्ठ, पाषाण आदि के ध्वंसरूप तथा परमाणुरूप से, मलिनो में
मालिन्य रूप स्थिति से एवं तलवार आदि में तीक्ष्णधारा के रूप से विद्यमान हे