Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 100, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
चित्तं नाशस्वभावं तद्विद्धि नाशात्मकं नृप ।
क्षणनाशो यतः कल्पचित्तशब्देन कथ्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उसीको स्पष्ट वतलाते है।
हे नृप, नाशस्वभाव उस चित्त को नाशात्मक जानिये, क्योकि क्षणभर के लिए भी
आत्मस्वरूपविस्मरणरूप वह नाश कल्पकालपर्यन्त विस्मृत चित्तशब्द से कहा जाता है