Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 11–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verses 11–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 11-13
संस्कृत श्लोक
यो निश्चयः सुरगुरोर्वाक्पतेर्भार्गवस्य च ।
दिवाकरस्य शशिनः पवनस्यानलस्य च ॥ ११ ॥
नारदस्य पुलस्त्यस्य मम चाङ्गिरसस्तथा ।
प्रचेतसो भृगोश्चैव क्रतोरत्रेः शुकस्य च ॥ १२ ॥
अन्येषामेव विप्रेन्द्र राजर्षीणां च राघव ।
यो निश्चयो विमुक्तानां जीवतां ते भवत्वसौ ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामभद्र, देवताओं के गुरु बृहस्पति, दानवों के गुरु शुक्राचार्य, भगवान अंशुमाली सूर्य, चन्द्रमा,
वायुदेवता, अग्नि, महामुनि नारद, महर्षि पुलस्त्य, मैं, अंगिरस प्रचेता, भृगु, क्रतु, अत्रि, शुक्र तथा
इन्हीं के तुल्य अन्यान्य जीवित ही रहकर मुक्त यानी जीवन्मुक्त विप्रेन्द्रो ओर राजर्षियों का जो आत्मा
के विषय में निश्चय हे, वही निश्चय आपको हो