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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 112

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 112 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 112

संस्कृत श्लोक

अखिलमिदमहं ममैव सर्वं त्वहमपि नाहमथेतरच्च नाहम् । इति विदितवतो जगत्कृतं मे स्थिरमथवास्तु गतज्वरो भवामि ।। ११२

हिन्दी अर्थ

तादात्म्य के अध्यारोप की दृष्टि से यह सब जगत मैं ही हूँ, संसर्ग के अध्यारोप की दृष्टि से यह सब (जगत) मेरा ही है, अपवाद की दृष्टि से तो अहंता के आरोप में निमित्तभूत अहंकार भी मैं नहीं हूँ तथा देह आदि इतररूप तो मैं सुतरां नहीं हूँ, इस प्रकार अध्यारोप एवं अपवाद से आत्मतत्त्व को जान लेनेवाले मेरे लिए यह जगत कृत्रिम-मायामय-रहे चाहे अकृत्रिम- आत्मरूप-ही रहे, दोनों तरह से भी मेँ सन्तापरहित हू