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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 12, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति निश्चयवन्तस्ते महान्तो विगतैनसः । सत्याः सत्ये पदे शान्ते समे सुखमवस्थिताः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी,पूर्वसर्ग मे दर्शित निश्चयवाले अतएव पापरहित, सद्रूप ब्रह्म मे निष्ठासम्पन्न वे जीवन्मुक्त महात्मा जनक आदि एकरूप, निर्विकार, सत्य पद में यानी शोधित तत्पदार्थरूप भीतरी परमपद में सुखपूर्वक अवस्थित हुए

सर्ग सन्दर्भ

ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग॑ बाहर से रोग एवं संग से शून्य और भीतर से स्वच्छ एवं आत्मस्वरूप से प्रकाशमान, गुरु वसिष्ठ द्वारा कही गई जनकादि ऋषियों की स्थिति का श्रीरामजी ने ग्रहण किया - यह वर्णन |