Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
अयं सोऽहमिदं चित्तमित्याद्यर्थोत्थया गिरा ।
शब्दप्रतिश्रवेणाद्राविवात्मात्मनि जृम्भते ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार एक ही शब्द पर्वत की संनिधि में प्रतिध्वनि के रूप में द्विरुक्त की नाई शोभित होता
है, उसी प्रकार यह, वही मैं, यह चित्त, इत्यादि अर्थो को लेकर प्रवृत्त वाणी से आत्मा ही अपनी आत्मा
में शोभित होता है