Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैवाज्ञातमज्ञत्वमभ्यागतमिव स्थितम् ।
तथा हि दृश्यते स्वप्ने चेतसात्मात्मनात्मनः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञात ब्रह्म ही जीवरूपता ओर जगद्रूपता को मानों प्राप्त होकर स्थित है, क्योकि स्वप्न में अपने
आत्मस्वरूप अन्तःकरण से आत्मा ही अनेक पदार्थो के रूप में दिखाई देता है, इसी बात को भगवान
बादरायण "आत्मनि चैव विचित्राश्च हि" इस सूत्र से कहते हैं