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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 68

संस्कृत श्लोक

सर्वत्रावस्थितं शान्तं चिद्ब्रह्मेत्यनुभूयते । मनोबुद्धीन्द्रियव्रातसमस्तकलनान्वितम् ॥ ६८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि प्रतिपुरुष मन, बुद्धि ओर इन्द्रियो की वृत्तियों का पार्थक्य होने के कारण आत्मचैतन्य में भेद का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, फिर वह अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप कैसे हो सकता है ? तो इस पर कहते है । मन, बुद्धि, इन्द्रियों के समूह तथा समस्त वृत्तियों में अनुगत, सर्वविध ओपाधिक भेदों का परित्याग कर प्रत्यक्‌ -स्वरूपात्म प्रमा का अवभासक (स्वप्रकाशस्वरूप), निर्विकार चैतन्य ब्रह्म ही मैं हू