Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 12, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
किं रोदिषि घनोद्वेगं मूढवच्चानुशोचसि ।
भ्रमस्युद्भान्तचित्तश्च सौम्यावर्ते तृणं यथा ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे शान्त श्रीरामचन्द्रजी, अत्यन्त उद्वि्मतापूर्वक आप क्यों रो रहे है, मूढ की तरह शोक क्यों कर
रहे हैं और जल-भौरों मे तृण की नाई भ्रान्त-चित्त होकर क्यों चलायमान हो रहे हैं ?