Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 120, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
ज्ञानानिलसमुद्भूता प्रोड्डीय क्वापि गच्छति ।
सर्वैव हि कला जन्तोरनभ्यासेन नश्यति ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
राजन्, जितने अज्ञान के अंश हैं (कलाएँ), वे सब
यदि बार-बार उनका परिशीलन न किया जाय तो, नष्ट हो जाते हैं, यह प्रसिद्ध है