Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 120, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
एकः स्फुरत्यखिलवस्तुषु विश्वरूप आत्मा सरःसु जलधिष्विव तोयमच्छम् ।
संशान्तसंकलनभूरिकलापमेकं सत्तांशमात्रमखिलं जगदङ्ग विद्धि ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सरोवरों मे या समुद्र में तरंग
आदि के रूप में केवल स्वच्छ जल ही जल स्फुरित होता है, वैसे ही समस्त वस्तुओं मे विश्वरूप एक
आत्मा ही स्फुरित होता है, दूसरा नहीं, अतः हे प्रिय, यह जो सारा संसार है, उसे तुम तत्त्वज्ञान से
अशेष संकल्पो से रहित सत्यरूप अद्वितीय ब्रह्म ही जानो