Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 121, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
मनुरुवाच ।
यावद्विषयभोगाशा जीवाख्या तावदात्मनः ।
अविवेकेन संपन्ना साप्याशा हि न वस्तुतः ॥ १ ॥
विवेकवशतो याता क्षयमाशा यदा तदा ।
आत्मा जीवत्वमुत्सृज्य ब्रह्मतामेत्यनामयः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
एक सौ बीसवाँ सर्गं समाप्त
एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग
जिस भावना से आकृष्ट होकर जीव संसार मे फस जाता है ओर जिस भावना से दूर होकर जीव
संसार से मुक्त हो जाता है उन दोनों भावनाओं का मनुमहाराज द्वारा उत्तम निरूपण ।
यदि आत्मा निरतिशयानन्दरूप ब्रह्म ही है, तब उसका जीव नाम कब तक रहता है ? इस प्रश्न पर
कहते हैं।
मनु महाराज ने कहा : हे राजन्, पुरुष को (आत्मा को) जब तक विषयभोग की अभिलाषा बनी
रहती है, तभी तक उसका जीवनाम रहता है। यह अभिलाषा भी अविवेक के कारण ही उसे होती है,
वास्तव में नहीं । जब विवेक से विषयभोग की अभिलाषा नष्ट हो जाती है, तब आत्मा अपना जीवरूप
छोडकर निर्विकार होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है