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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 121, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

ऊर्ध्वादधस्तथाधस्तात्पुनरूर्ध्वं व्रजंश्चिरम् । मा संसारारघट्टस्य चिन्तारज्ज्वां घटीभव ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र भोग की अभिलाषा ही जीव को स्वर्ग, नरक आदि में खींच ले जाती है, अतः उसे छोड़ देना चाहिए, यों कहते हैं। हे राजन्‌, कर्मवश से ऊपर के लोक से नीचे के लोक में तथा नीचे के लोक से ऊपर के लोक में दीर्घ काल तक आवागमन कर रहे तुम संसाररूपी रहट की भोगचिन्तारूपी रज्जु में घड़े के सदूश फँस मत जाओ