Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 13, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 13, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
धारणासनदेशादिसाध्यत्वेन सुसाध्यताम् ।
नायाति योगो ह्यथवा विकल्पो नैव शोभनः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
प्रशस्त देश, काल, विषय आदि बाह्य हेतुओं की अपेक्षा होने से भी योग दुष्कर है, यों कहते है ।
चूँकि, यह प्राणसंरोधरूप योग धारणादेश (बाह्य पर्वत-शिखर, चन्द्र, तारा आदि देश ओर आन्तर
हृदय, कण्ठ, तालुमूल, भ्रूमध्य आदि देश), आसन-देश (सम; पवित्र; कंकड, अग्नि ओर बालुका से
वर्जित; कलकल ध्वनि, जलाश्रय आदि से शून्य; मनोहर; चक्ष में पीडा न न पहुँचानेवाला आदि विशेषणो
से श्रुतिस्मृति में वर्णित आसनदेश) आदि से साध्य हे, अतः सुख साध्य नहीं हो सकता । (निरुत्साह,
मूढबुदधि, मूर्ख कापुरुषो की नाई पण्डित, समर्थ ओर प्रयत्नशील अधिकारी पुरुष को शास्त्रीय साधनों
में सुखसाध्यत्व और कष्टसाध्यत्व का विकल्प कर चिन्ता करना उचित नहीं, इस आशय से कहते हैं।)
श्रीरामजी, अथवा आपके लिए सुखसाध्यत्व ओर कष्टसाध्यत्व का विचार करना उचित नहीं है