Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 13, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 13, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अज्ञानं पुनरज्ञातं स्वप्नेष्वपि न तद्भवेत् ।
ज्ञानं सर्वास्ववस्थासु नित्यमेव प्रवर्तते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान और अज्ञान के स्वरूप का विवेक करने की सामर्थ्य न रहने पर ही विचार में अप्रता होती
है, परन्तु वह असामर्थ्य प्रमाण में कुशल पुरुष के लिए तो स्वप्न में भी नहीं रह सकती, इस आशय
से कहते हैं ।
वह प्रसिद्ध अज्ञान स्वप्न में भी अज्ञात नहीं रह सकता और ज्ञान भी सभी अवस्थाओं में सदा ही
स्वयं प्रकाशमान रहता है। चूँकि अज्ञान सदा ही साक्षी द्वारा भासित होता है, ज्ञान स्वयंप्रकाश होने से
स्वतः ही प्रकाशमान रहता है और इन दोनों का वैधर्म्य अनुभव से ही प्रस्फुरित हे, इसलिए ज्ञान-
अज्ञान का विवेक हो जाने से आत्मज्ञानरूप योग सरल है, प्राणनिरोधरूप योग वैसा न होने से दुष्कर
है, यह भाव हे