Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 13, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 13, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
द्वावेव किल शास्त्रोक्तौ ज्ञानयोगौ रघूद्वह ।
तत्रोक्तं भवते ज्ञानमन्तस्थं ज्ञेयनिर्मलम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अवान्तर प्रश्न का (बीच में आये हुए (कतरः शोभनः” वाले प्रश्न का) निरास कर पहले
प्रश्न का उत्तर देने के लिए उपक्रम करते है ।
हे रघुवीर, ज्ञान ओर योग - ये दोनों ही उपाय शास्त्रों में कहे गये हैँ । उन दोनों में से आत्मपदार्थरूप
ज्ञेय को निर्मल करनेवाला सब ज्ञानो से परे स्थित आत्मज्ञान आपको बतलाया गया