Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 14, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
तस्याहं मानसः पुत्रो वसिष्ठः श्रेष्ठचेष्टितः ।
ऋक्षचक्रे ध्रुवधृते निवसामि युगं प्रति ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
उस पितामह ब्रह्मदेव का मे सदाचार-सम्पन्न वसिष्ठ नाम का मानस हू । और ध्रुवजी द्वारा
धारण किये गये सप्तर्षिलोक में वैवस्वत मन्वन्तर तक निवास करता हूँ