Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
नीरन्ध्रमञ्जरीपुञ्जं नीरन्ध्रमणिगुच्छकम् ।
नीरन्ध्रांशुकरत्नाढ्यं लताविलसनाकुलम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके ऊपर घनीभूत मंजरीयाँ थीं, घनीभूत मणिरूप गुच्छे थे, घनीभूत रत्नरूपी
परिधानीय दिव्य वस्त्रों से आद्य था अर्थात् अर्थियों की इच्छापूर्तिं करनेवाला था, लताओं के नृत्य से
व्याप्त था