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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

स्वाकारविपुलं भृङ्गानुत्सार्य वलयस्वनैः । अप्सरोभ्रमरीभिश्च गृहीतकुसुमान्तरम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसका अपना निजीस्वरूप अत्यन्त विस्तृत था, उसके फूलों का भीतरी रस अपने कंकणों के क्रणितों से बाह्य भ्रमरो को हटाकर अप्सरारूपी भ्रमरियों ने चूस लिया था