Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 16, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 16, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 16 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
युष्मद्विधास्त्रिभुवनप्रभुपूज्यरूपा आकर्णयन्ति यमुदारधियो महान्तः ।
तेनाशुभं प्रकथितेन विनाशमेति मेघास्पदेन विभवेन यथार्कतापः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महानुभाव, तीनों लोकों के नियन्ता और
परम पूज्य आपके सदृश उदारबुद्धि महात्मा जिस वृत्तान्त का श्रवण करते हैं, उस वृत्तान्त का
भलीप्रकार कथन करने से वक्ता ओर श्रोता दोनों का पाप उस प्रकार विनष्ट हो जाता है, जिस
प्रकार मेघावलम्बित वृष्टि, छाया, अरण्य आदि वैभवों से सूर्य का ताप विनष्ट हो जाता है