Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
स्वस्थीकृतजगज्जातस्वव्यापारस्थचेतसः ।
यदृच्छया करस्पन्दो यस्यासुरपुरक्षयः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, सत्य-
संकल्प होने के कारण उनका अन्तःकरण एकमात्र कल्याण की भावना से ही जगत-समूह को अपनी
प्रकृति में रखने के लिए समाधि में स्थित हे । कदाचित समाधि का आकस्मिक भंग हो जाने पर उत्पन्न
हुआ उनके हाथ का स्पन्दन असुरो के बड़े-बड़े नगरों को, असुरो के साथ, विनष्ट कर डालता है