Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
एकाग्रमूर्तयः स्नेहरागद्वेषविवर्जिताः ।
स्वशना यस्य ते शैलाः सरसा अपि नीरसाः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
तृष्णाओं से शून्य प्रसिद्ध मेरु, हिमालय आदि पर्वत ही उनकी एकाग्रता ध्यान की मूर्तियाँ हैं