Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
क्षीरसागरसंभूतः प्रसृतामृतनिर्झरः ।
प्रतिबिम्बकरः श्रीमान्यस्य चूडामणिः शशी ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षीर-सागर से उत्पन्न हुआ ओर अमृत का
झरना बहानेवाला अत्यन्त कान्तियुक्त चन्द्रमा उनका दर्पणभूत चूडामणि (शिरोभूषणमणि) है