Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अनारतशिरश्चन्द्रप्रस्रवेणामृतीकृतः ।
यस्येन्द्रनीलवत्कालकूटः कण्ठे विभूषणम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
निरन्तर मस्तक में स्थित चन्द्रमा के अमृतप्रवाह से जिसकी विषशक्ति निकल गई है ओर जिसमें
संजीवनशक्ति प्राप्त हुई हे, ऐसा इन्द्रनील मणि की नाई कालकूट महाविष उनके कण्ठ का भूषण
है