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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

निर्मलानि जितेन्दूनि सृष्टानि घटितानि च । यस्यास्थीन्येव रत्नानि देहकान्तमयानि च ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त निर्मल, तेजस्वी चन्द्रमा का भी तिरस्कार कर देनेवाली, मणियों के सदुश सानपर चढाकर विशोधित की गई, माला आदि के आकार में गुँथी गई, संपूर्ण शरीरो में मनोरम ब्रह्मा आदि के शरीरो की विकारभूत हड्डियाँ ही उनके शोभाकारक रत्न हैं