Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 19, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
सौवर्णचन्द्रपीठाढ्यो रत्नाढ्यशिखराङ्गुलिः ।
ध्वनद्द्वीपाब्धिवलयो भुवेवोन्नमितो भुजः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
वह पृथ्वी के द्वारा ऊपर को उठाया गया
मानों एक हाथ हे । उस हाथ में किंपुरुष आदि देश ही चन्द्राकृति सुवर्ण निर्मित केयूर हैं, रत्नरूप
अँगूठियों से सुशोभित शिखर ही अंगुलियाँ है और शब्द कर रहे द्वीप और समुद्र ही कंकण हैं