Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, Verses 29–30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 19, verses 29–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
वृतः कुलाद्रिसामन्तैर्जम्बूद्वीपासने स्थितः ।
राजा चन्द्रार्कनयने भ्रमयञ्छैलसंसदि ॥ २९ ॥
तारौघमालतीमाल्यो दिग्दशैकाम्बराम्बरः ।
नागजातिद्वयस्थात्मा नाकनायकभूषणः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
वह
पर्वतों का राजा है, उसके चारों ओर हिमालय आदि सात कुलपर्वत सामन्तरूप से विराजित हैं; वह
जम्बूद्वीप सिंहासन के ऊपर विराजमान है और पर्वतों की सभा में चन्द्र एवं सूर्यरूपी नेत्रों से दृष्टिपात
करता है। तारावली (तारकाओं की पंक्ति) ही उसकी मालती-माला है, दिशारूपी पल्लवा से सुशोभित
आकाश ही उसका एकमात्र वस्त्र है, वह सर्प और हाथी-इन दोनों का आश्रय-स्थान है, इन्द्र, उपेन्द्र
आदि देवराज ही उसके आभूषण हैं