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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, Verse 35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 19, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

अस्य त्वीशानदिग्भागे पद्मरागमयं बृहत् । विद्यते शृङ्गमपरो दिवाकर इवोदितः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसके पैर सोलह हजार योजन नीचे पृथ्वी में अवस्थित हैं, जिनकी नाग, असुर और बड़े-बड़े सर्प पूजा करते हैं ॥ ३ २॥ इसकी देह सूर्य और चन्द्ररूप लोचनों से युक्त तथा अस्सी हजार योजन ऊँची स्वर्ग-स्थान तक पहुँची है, वहाँ देवता, गन्धर्वं एवं किन्नर उसकी पूजा करते हैं ॥३ ३॥ इस पर्वतराज का आश्रय लेकर ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि, देव, पितर, गन्धर्व, किन्नर, अप्सराएँ, विद्याधर, यक्ष, राक्षस, प्रमथ, गुह्यक और नाग-ये चौदह प्रकार के प्राणी उस प्रकार जीवन निर्वाह करते हैं, जिस प्रकार प्रधान गृहपति का आश्रय कर इतर बन्धुगण जीवन-निर्वाह करते हैं | यह इतना बड़ा विस्तृत है कि वे एकत्र रहने पर भी एक- दूसरे का नगर या स्थान नहीं देख पाते ॥ ३ ४॥ इसके ईशानकोण में माणिक का बना हुआ एक विशाल शिखर है, जिसे देखने से ऐसा प्रतीत होता है मानों दूसरा उदित हुआ सूर्य ही हो