Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्कन्धव्यूढार्कशशिषु वहत्स्वविरतं जवात् ।
वातस्कन्धातिवातेषु कच्चित्तात न खिद्यसे ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी
ने कहा : प्रिय पक्षिराज, माला की नाई अपने कन्धे पर बारह सूर्य ओर चन्द्रमा को ढोनेवाले तथा
प्रवह आदि वातस्कन्धो का अतिक्रमण करनेवाले प्रलय-वायुओं के अविरत बहने पर क्या तुम्हे खेद
नहीं होता ?