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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

दग्धोदयास्तशैलेन्द्रवनव्यूहै रवेः करैः । चिरमत्यन्तमासन्नैः कच्चित्तात न खिद्यसे ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

भुशुण्डजी, चिरकाल से अत्यन्त आसन्न उदयाचल ओर अस्ताचल के अरण्यं को दग्ध कर देनेवाले सूर्य -किरणोँ से क्या तुम्हें खेद नहीं होता ?