Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अजस्रमिह विश्रान्तैः कल्पजीमूतमण्डलैः ।
परशुच्छेदनीहारैः कच्चित्तात न खिद्यसे ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रियवर, मेरु-शिखर पर विश्रान्ति किये प्रलयकालीन
मेघ-मण्डलों से तथा परशु की धारा को भी क्षत कर देनेवाले शिलासदृश घनीभूत कुहरे से क्या तुम्हे
खेद नहीं होता ?