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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

रत्नगुच्छप्रकाशाख्ये ब्रह्मन्कल्पलतागृहे । प्राणापानप्रवाहेण वेद्मि कल्पमखण्डितम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रकाश अधिक होने के कारण जब दिन और रात का विभाग ही ज्ञात नहीं हो सकता, तब यहाँ स्थित होकर तुम काल की कलनगति कैसे जानते हो ? इस प्रश्न पर कहते हैं । चमकीले रत्नों के प्रकाश से पूर्ण कल्पलता-गृह में उपस्थित होकर मैं प्राणायाम के प्रवाह से यानी स्वरोदयशास्त्र में बतलाये गये उपाय से अखण्डित कल्प जान लेता हूँ