Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
सारासारपरिच्छेदि बोधाद्विश्रान्तिमागतम् ।
निरस्तचापलं शान्तं सुस्थिरं मे मुने मनः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
मन की स्थिरता के बल से मुझे खेद नहीं प्रतीत होता, इस आशय से कहते हैं।
मुनिवर, यह सारभूत वस्तु है और यह असारभूत वस्तु है, इस प्रकार के विवेकयुक्त बोध से उत्तम
शान्ति को प्राप्त हुआ मेरा मन चंचलताशून्य, शान्त ओर भली प्रकार स्थिर है