Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
भवदागमनाद्ब्रह्मन्निदानीं मुदिताशयाः ।
मन्दरोद्धूतसर्वाङ्गः क्षीरोदो येन तन्यते ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्, जिस अमृत के लिए मन्दराचल द्वारा सर्वागों से क्षुब्ध हुए क्षीर-सागर का मंथन किया जाता
है, आपके उसी अमृतरूपा आगमन से हम लोग अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये हैं