Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
एवं चतुर्युगं साग्रं नीरन्ध्रैरचलैर्वृताम् ।
अप्रवृत्तजनाचारां संस्मरामि धरामिमाम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
एक समय यह
पृथ्वी चार युगो से अधिक काल तक निबिड पर्वतां से व्याप्त थी; उसमें मनुष्यो का संचरण भी नहीं
होता था-इसका भी मुझे स्मरण हे