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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

भुजावष्टम्भविनमन्मेरुर्नारायणो यदा । मन्दरं प्रोद्दधाराद्रिं तदा नाकम्पत द्रुमः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

दो भुजाओं के अवष्टम्भ (पकड) से मेरु को दबाकर जब चतुर्भुज भगवान नारायण ने इतर दो हाथों द्वारा समुद्र से मन्दराचल का उद्धार किया, तब भी यह वृक्ष कम्पित नहीं हुआ