Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
यादृशो यादृशाचारो यादृक्संस्थानदिग्गणः ।
सर्गोऽयं तादृशानेव त्रीन्सर्गान्संस्मराम्यहम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त कल्पो मे तत्-तत् अधिकारी पुरुषों के नाम और स्वरूप एक से होने पर भी सब पदार्थों के
(भ) सप्तम श्लोकस्थ क्रिया के साथ सब सप्तम्यन्तों का सम्बन्ध है ।
सब अवयव और आचरण एक ही होने चाहिए, यह नियम नहीं है, किन्तु काकतालीयन्याय से किसी
समय एक-से ही हो जाते हैं, इस आशय से कहते हैं।
महाराज वसिष्ठजी, यह सर्ग जैसा है, इसका जिस प्रकार आचरण है, इसके जिस प्रकार के
अवयव संस्थान तथा दिशागण हैं, ठीक इसी तरह के तीन सर्ग पहले हो चुके हैं-इसका मुझे स्मरण
है