Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
चरतां जगतः कोशे व्यवहारवतामपि ।
कथं विहगराजेन्द्र देहं मृत्युर्न बाधते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
हे पक्षियों के श्रेष्ठ राजा, जगत-कोश में विचरण कर रहे ओर व्यवहार कर रहे भी प्राणियों की
देह को मृत्यु किस उपाय से यानी कैसे दोषों का त्याग एवं कैसे गुणों का उपार्जन करने से बाधा नहीं
पहुँचाती