Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
जानन्नपि हि सर्वज्ञ ब्रह्मञ्जिज्ञासयेव माम् ।
पृच्छसि प्रभवो नित्यं भृत्यं वाचालयन्ति हि ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
भुशुण्ड ने कहा : हे सर्ववित् ब्रह्मन्, आप यद्यपि सब कुछ जानते हैं, तथापि जो
मुझसे, जिज्ञासु की नाई, पूछते हैं, वह ठीक ही है, क्योकि जो समर्थ होते हैं, वे प्रश्नों द्वारा अपने
सेवकों की वाकृपदुता प्रसिद्ध कराते हैं