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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

दोषमुक्ताफलप्रोता वासनातन्तुसंततिः । हृदि न ग्रथिता यस्य मृत्युस्तं न जिघांसति ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें समस्त दोषों की आश्रय वासना का विनाश ही मृत्यु पर विजय पाने के लिए मुख्य उपाय है, ऐसा कहते हैं। महाराज, रागादि दोषरूपी मोती जिसमें पिरोये गये हैं, ऐसी वासनारूपी तन्तुसन्तति जिसके हृदय-कमल में ग्रथित नहीं रहती, मृत्यु उसे मारने की इच्छा नहीं करती अर्थात्‌ जैसे हार आदि आभरणो का परित्याग किये पुरुषों को चोर मारने की इच्छा नहीं करते वैसे ही प्रकृत में समझना चाहिए, यह भाव है