Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
शरीरतरुसर्पौघाश्चिन्तार्पितशिरःफणाः ।
आशा यं न दहन्त्यन्तर्मृत्युस्तं न जिघांसति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, शरीररूपी वृक्ष
के कोटर में रहनेवाले सर्पो के समूहरूप तथा चिन्तारूपी फणविस्तारों को सिर में धारण करनेवाली
आशाएँ जिसको भीतर से दाह नहीं पहुँचाती उसे मृत्यु मारने की इच्छा नहीं करती । राग -द्वेषरूपी विष
से परिपूर्ण अपने मनरूपी बिल में रहनेवाला लोभरूपी सर्पं जिसको दंश नहीं करता उसे मृत्यु मारने की
इच्छा नहीं करती